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*श्री राधे*

मनुष्य  गृहस्थ में हो या विरक्त में उसका जीवन धर्म के अनुसार धर्म के लिए जीना हो धर्म के लिए काम करना हो । प्रत्येक क्रिया को भगवान को समर्पित करता चले ।

किसी में आसक्त न रहे शरीर,स्त्री,पुत्र,धन आदि क्योंकि ये एक दिन छूटने वाला ही है ।
भीतर से विरक्त रहे और बाहर से रागी के समान लोगो में साधारण मनुष्यो जैसा ही व्यवहार करे ।

भीतर से ममता न रखकर सबका अनुमोदन करे । अपना रुख संसार से मोड़ कर अपना मन मनमोहन में लीन कर दे ।
ये प्रभु को प्राप्त करने की एक सुंदर जीवन शैली है ।

 

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