जो जीव विषय भोग को ही सुख मान बैठा है उसकी मति भगवान के माया द्वारा ठगी का चुकी है ।
हमारे पास हर चीज की सुविधा है तो हम सुखी, नहीं है तो दुखी ये कैसी मानसिकता है । सुख दुख का आकलन सुविधायों से नहीं किया जाना चाहिए बल्कि जो है जितना है प्रयाप्त है यदि ये स्थिति अंत:कर्ण की है तो आपसे ज्यादा सुखी इस दुनिया में सायद कोई है ।
व्यक्ति को और और पाने कि इच्छा ही उसे जीर्ण करते जाती है । लोभ हो तो भजन का, अच्छी शिक्षा पाने की, सेवा की, सत्कर्म की तो हमारी अंतरात्मा हृष्ट पुष्ट होगी ।
संतोषम परम सुखम संतोष में ही सबसे बड़ा सुख है ।
आभार व्यक्त करते चलो साहब उस परमात्मा का जितना दिया उतनी मेरी औकात कहा थी ।
