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*जय सियाराम*

Sath sudharhi satsangati paai

 

सठ सुधरही सत्संगती   ।
पारस परस कुधात सुहाई ।।
जीवन में सत्संग ऐसी सुमहोषधी है जिसके आश्रय में रहने से काम, क्रोध, मद, लोभ रूपी रोग का क्षय होता रहता है ।

कितना भी बड़ा दुष्ट क्यो न हो यदि सत्संग का आश्रय लिया तो रत्नाकर डाकू बल्मिक बन गए अर्थात् अंधकार से प्रकाश हो प्राप्त कर गए वास्तव में अज्ञान से ज्ञान का मार्ग सत्संग ही तो दिखाता है ।

सत्य का संग करा दे वही तो सत्संग है , जो जीव को अपने स्वरूप का यथार्थ बोध करा दे नित्य, शाश्वत, अजन्मा, अविकार में स्थित कर दे वही सत्संग है ।
जो परमात्मा से मिला दे वही सत्संग है ।

 

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