काहू न कोऊ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सब भ्राता ।।
हर व्यक्ति को यही लग रहा है कि वो किसी दूसरे के कारण दुखी है पर सत्य तो लक्ष्मण जी केवट को समझाते हुए कहते है । तुम्हे लग रहा है श्री राम कैकई मैया के कारण दुख पा रहे है नहीं प्यारे सब अपने ही कर्मो का किया कराया प्राप्त हो रहा है ।
कोई किसी को सुखी दुखी नहीं कर सकता ये तुम्हारे की कर्म तुम्हे सुखी दुखी कर रहे है । कबीर जी कहते है बोया पेड़ बबूल का आम कहा ते खाय।
प्यारे जैसा करोगे ठीक वैसा ही घूम फिर कर वापस मिलेगा । इसलिए वो न करो जो तुम्हे अच्छा न लगता हो जो तुम्हे अच्छा लगता है अपने प्रति जो प्यार जो सम्मन जो आदर जो व्यवहार पाने कि इच्छा रखते हो वहीं दूसरे को देने योग्य है । यही सबसे सुंदर कर्म है यही सबसे सुंदर ज्ञान है ।।
